Saturday, 23 June 2012


मुझे मालूम है जुगनू से कमतर है मेरी हस्ती,
मगर सूरज ना जाने क्यूँ मेरी हस्ती से जलता है


उधर सूरज का है दावा, कि रोशन है जहाँ मुझसे,
मगर यह जुगनू खुद की रोशनी से कैसे जलता है 


फकत तिनके से छोटी है समंदर में मेरी कश्ती,
समंदर फिर भी जाने भी क्यूँ मेरी कश्ती से जलता है 


कि आखिर में भी इन्सां हूँ मुझे भी हक है जीने का,
महल में रहने वाला क्यूँ मेरी बस्ती से जलता है 


मै अपनी मुफलिसी, बेचारगी में मस्त हूँ नवरंग,
वो ऊँचे घर में रहकर भी मेरी मस्ती से जलता है 

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